Wednesday, August 11, 2010

बंदर बंदर

यहाँ ये फोटो यहाँ साफ़ नहीं है.. पर ध्यान से देखें तो पता चलेगा की ये ऋषिकेश मे लक्ष्मण झूला है....   दो बंदर भी हैं....  फिर बंदरों के पीछे हैं हम तीन..  मैं (पांच साल थी मरी उम्र तब) और मेरे पापाजी और माताजी.. 

आम तौर पर लोगो को ये फोटो नकली लगता है क्यूंकि बंदरों के गले मे कोई रस्सी नहीं है.. जंगली बंदर कैसे किसी के साथ बैठ सकते हैं .. वो भी आराम से.. 

याद करने के कोशिश करता हूँ  की मैं डरा था या नहीं???



...पर अपने को फोटो मैं देख कर लगता है की मैं डरा हुआ था थोडा सा.... 


पर उस के बाद जब भी मौका लगा मैंने बंदरों के साथ और बंदरों के खूब फोटो खींची.. 


यहाँ पर भी कोशिश तो ये थी की बंदर मेरे पास आ जाए पर.. पेड के नीचे आप बंदर को देख पायेंगें...  नंदी हिल्स बंगलोर..




फिर से ... बंदर फेंटा कोल्डड्रिंक पीते हुए.. 
अगर आँखों मैं देखो तो दर्द नजर आएगा,,, बेनर - गट्टा राष्ट्रीय पार्क मे एक बंदर.. 



बारिश मे बंदर छिपकली को मात दे रहा है.. 

विश्व पुस्तक मेला २००८




बचपन से मुझे मेलों मे जाने का बहुत शौक है. खाना बहुत तरह का मिलता है.  दशहरे का मेला , मेरठ मैं नौचंदी का मेला... सब आज भी याद है. परिवार के साथ, अड़ोसी - पडोसी सब एक साथ टोली बना कर, हाथ पकड़ कर जाते थे. बचपन मे ऐसा कोई साल ही गया होगा जब हम लोग नौचंदी नहीं गए. 

बाद मैं मुझे पता चला की दिल्ली मैं प्रगति मैदान मे व्यापार मेला लगता है. क्लास १२ मैं पहली बार दोस्तों के साथ मेरठ से आने वाली शटल ट्रेन पकड कर मेले मैं आ गया. सुबह से साम तक घुमते घुमते थक गया. हम लोग करीब १५ थे जब टिकट लिया. पर वापसी मैं पता काला की सब २-३ की टीम मैं वापस आये थे.. सब बिखर गए थे... व्यापार मेले मैं भीड़ ही बहुत ज्यादा होती है. वो साल था १९९८. फिर काफी बार मेलों मैं आया.

दो साल मे एक बार लगने वाले विश्व पुस्तक मेले को देखने का सौभाग्य मुझे सिर्फ २००८ मैं ही मिला. इससे पहले कभी तो लखनऊ मे कॉलेज, बाद मैं बंगलोर.. कभी मौका ही नहीं मिला वहाँ जाने का... 

२००८ मैं हफ्ते के काम वाले दिन छुट्टी लेकर मैं पुस्तक मेला देखने गया. हर तरफ अकेले लोग. किताब ही किताब. मैं सोच रहा था की कोई साथ होता तो अच्छा होता.. पर अंदर जाते ही लगा अच्छा है की कोई साथ मैं नहीं है... 


अल्पना ड्राइंग मैं स्कूल मैं किया करता था पर पहली बार देखने को मिला की वो चित्रकार कैसे बनाते हैं....

फिर किताबे की दुनिया से दूर गांधीजी की दुनिया दिखाई दी. फिर सब   गांधी ही गांधी था. एक शांत स्थान.... मौन.. और साफ़... मन कर ही नहीं रहा था की इस दुनिया से बाहर जाऊं. .. 
आज भी जब किताबों के बारे मैं बात होती है तो घूम फिर के "माय एक्स्प्रिमेंट विथ ट्रुथ " तक बात अक्सर     पहुँच  ही जाती है. 
अब पता नहीं कब तो मेला लगेगा और कब मैं जा पाऊंगा .. पर ये तय है.. मैं किताबों से दूर नहीं रह सकता.. 


(एक बात मैंने नहीं बताई की दरीयागंज दिल्ली मे हर इतवार को किताबो का बाज़ार लगता है.. किताबें पुरानी होती हैं,, और सस्ती भी..)                                                                                






फोन मे कम्पूटर





२००८ जनवरी मे ये पहला फोटो था जो मैंने अपने नए नोकिया (N70) से अपने कंप्यूटर का लिया था . कुछ तो नोकिया के फोन से लगाव मुझे पहले सा था पर उस समय ये फोन मेरे लिए कमाल कर रहा था. फोटोग्राफी के शौक के चलते मैंने रोल वाला कैमरा जम कर इस्तेमाल किया. जब  मैं लखनऊ मैं प्रबंधन की पढाई कर रहा था तब मेरे कैमरे का खर्चा मेरे महीने के कुल खर्चे से ज्यादा था. हर समय कैमरा आप अपने साथ नहीं रख सकते पर.. फोन आप अपने से दूर नहीं रखते.  


आज भी ये दोनों ही मेरे सबसे करीबी दोस्त हैं एक मेरा फोन और दूसरा मेरा (HP) लैपटाप कंप्यूटर. दिन मे फोन कभी दूर नहीं होता और कंप्यूटर मुझे अपने से दूर जाने नहीं देता.