बचपन से मुझे मेलों मे जाने का बहुत शौक है. खाना बहुत तरह का मिलता है. दशहरे का मेला , मेरठ मैं नौचंदी का मेला... सब आज भी याद है. परिवार के साथ, अड़ोसी - पडोसी सब एक साथ टोली बना कर, हाथ पकड़ कर जाते थे. बचपन मे ऐसा कोई साल ही गया होगा जब हम लोग नौचंदी नहीं गए.
बाद मैं मुझे पता चला की दिल्ली मैं प्रगति मैदान मे व्यापार मेला लगता है. क्लास १२ मैं पहली बार दोस्तों के साथ मेरठ से आने वाली शटल ट्रेन पकड कर मेले मैं आ गया. सुबह से साम तक घुमते घुमते थक गया. हम लोग करीब १५ थे जब टिकट लिया. पर वापसी मैं पता काला की सब २-३ की टीम मैं वापस आये थे.. सब बिखर गए थे... व्यापार मेले मैं भीड़ ही बहुत ज्यादा होती है. वो साल था १९९८. फिर काफी बार मेलों मैं आया.
दो साल मे एक बार लगने वाले विश्व पुस्तक मेले को देखने का सौभाग्य मुझे सिर्फ २००८ मैं ही मिला. इससे पहले कभी तो लखनऊ मे कॉलेज, बाद मैं बंगलोर.. कभी मौका ही नहीं मिला वहाँ जाने का...
२००८ मैं हफ्ते के काम वाले दिन छुट्टी लेकर मैं पुस्तक मेला देखने गया. हर तरफ अकेले लोग. किताब ही किताब. मैं सोच रहा था की कोई साथ होता तो अच्छा होता.. पर अंदर जाते ही लगा अच्छा है की कोई साथ मैं नहीं है...
अल्पना ड्राइंग मैं स्कूल मैं किया करता था पर पहली बार देखने को मिला की वो चित्रकार कैसे बनाते हैं.... फिर किताबे की दुनिया से दूर गांधीजी की दुनिया दिखाई दी. फिर सब गांधी ही गांधी था. एक शांत स्थान.... मौन.. और साफ़... मन कर ही नहीं रहा था की इस दुनिया से बाहर जाऊं. ..
आज भी जब किताबों के बारे मैं बात होती है तो घूम फिर के "माय एक्स्प्रिमेंट विथ ट्रुथ " तक बात अक्सर पहुँच ही जाती है. अब पता नहीं कब तो मेला लगेगा और कब मैं जा पाऊंगा .. पर ये तय है.. मैं किताबों से दूर नहीं रह सकता..
(एक बात मैंने नहीं बताई की दरीयागंज दिल्ली मे हर इतवार को किताबो का बाज़ार लगता है.. किताबें पुरानी होती हैं,, और सस्ती भी..)